Talking to children about Autism (Hindi)

ऑटिज्म के बारे में बच्चों के साथ बातचीत करना

1. अंतरों को नियमित बनाकर तैयारी करें

वास्तविक समावेश तब होता है जब हर किसी के अंतरों को सामान्य रूप से स्वीकार किया जाता है।

जब हम अलग होने को ‘सामान्य’ बात मानते हैं, तो हमारे बच्चों को यह बताने को कि वे ऑटिस्टिक हैं (या, असल में, उनके भाई-बहनों या कज़िन या साथियों या किसी ओर को ऑटिज्म के बारे में बताने) को मात्र मानव परिस्थिति की प्राकृतिक विविधता के भाग के तौर पर दर्शाया जा सकता है।

ऑटिज्म किसी अन्य अंतर की तरह ही एक प्राकृतिक अंतर है।

2. शारीरिक अंतरों को नियमित बनाएँ

यह दिखाकर शुरूआत करें कि शारीरिक अंतर सामान्य बात है।

इससे पहले कि आपकी संतान दिमागी अंतरों के बारे में सुनने के लिए तैयार हो, जो कि भावात्मक हो सकते हैं और कल्पना करने में कठिन हो सकते हैं, उन्हें शारीरिक अक्षमताओं सहित शारीरिक अंतरों पर ध्यान देने, इन्हें नियमित बनाने और स्वीकार करने में सहायता देकर शुरूआत करें।

3. दिमागी अंतरों को नियमित बनाएँ

हर दिमाग अलग-अलग तरीके से सोच-विचार करता है, अर्थ लगाता है, महसूस करता है और संचालन करता है।

हमारे दिमागी अंतरों (हमारी रूचियों, हमारी पसंद और नापसंद, हमारे स्वाभाविक रूझानों, हमारी संवेदनशील अनुभूतियों, हमारी संचार प्राथमिकताओं) को नियमित बनाना अहम है।

साथ ही उन अंतरों को मानवता की समृद्धि से जोड़ना भी अहम है: हमें अपने कलाकारों और आर्किटेक्ट्स (वास्तुकारों), हमारे संगीतज्ञों और गणितज्ञों द्वारा विश्व को शानदार स्थान बनाने की आवश्यकता है, जो यह वर्तमान में है।

अंतर केवल सामान्य ही नहीं होते हैं: ये महत्वपूर्ण भी होते हैं।

4. क्षमताओं का पता लगाएँ

हर व्यक्ति की क्षमताएँ और सामर्थ्य होता है, चाहे उसकी समर्थन और संचार आवश्यकताएँ कैसी भी हों।

हर किसी में भिन्न-भिन्न क्षमताएँ और सामर्थ्य होता है।

अपनी खुद की, अपने परिवार की, और अपनी संतान की विशिष्ट क्षमताओं का पता लगाएँ।

वे कौन से काम बढ़िया करते हैं?

वे किन कामों में समृद्ध और सफल होते हैं?

क्षमताओं की पहचान करने, उन्हें नाम देने और इनका प्रयोग करने से तनाव के लिए सकारात्मक प्रतिरोध का निर्माण होता है और इससे प्रतिरोधक्षमता का निर्माण होता है।

5. चुनौतियों का पता लगाएँ

हर व्यक्ति, चाहे वह कितना भी सक्षम हो, उसे कुछ ऐसी चुनौतियाँ होती हैं और कुछ ऐसे क्षेत्र होते हैं जिनमें उसे अधिक सहायता की ज़रूरत होती है।

चुनौतियों के बारे में चर्चा करने के ढंग का एक तरीका अपनी गलतियाँ मानना है, जब गलती की हो तो माफी मांगना है, यह मानना है कि आप गलतियाँ कर सकते हैं और जैसे-जैसे आपकी खुद की चुनौतियाँ सामने आएँ उन्हें स्पष्ट रूप से बताना है।

फिर आप अपनी संतान का समर्थन कर सकते हैं कि वह खुद से यह कर सके।

चुनौतियाँ आपकी संतान की पहचान के लिए उतनी ही बुनियादी हैं जितनी उनकी क्षमताएँ।

6. ‘ऑटिज्म संबंधी वार्तालाप’

ऑटिज्म तो केवल किसी व्यक्ति की क्षमताओं, चुनौतियों और दिमागी अंतरों के विशेष समूह को वर्णन करने वाला शब्द है।

हर कोई शारीरिक तौर पर अलग है, हर कोई न्यूरोलॉजिकल तौर पर अलग है, हर किसी की अलग-अलग क्षमताएँ हैं, और हर किसी की अलग-अलग चुनौतियाँ हैं।

परन्तु… आपकी संतान के समान क्षमताओं और चुनौतियों तथा दिमागी अंतरों वाले दूसरे लोग भी हैं।

आपकी संतान के ‘समान रूप से अलग’ दिमाग वाले सभी लोग ऑटिस्टिक हैं। ऑटिस्टिक समुदाय ‘न्यूरोकिंड्रेड’ का एक नया परिवार है, जिससे आपकी संतान सम्बन्धित है।

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